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Apr 16, 2020, 15:14 IST

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दुनिया के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है जबकि समाज की पूरी चिंतनधारा और जीवन पद्धति में आमूलचूल बदलाव परिलक्षित हुआ। विषाणु अदृश्य होकर धरती की पूरी संचलन पद्धति को बदल देंगे कई बार ऐसा सोच पाना भी मुश्किल है लेकिन जो अदृश्य है, उसकी ताकत असीमित है। अज्ञात भय मनुष्य को सर्वाधिक भयभीत करने की क्षमता रखता है। अगर गत हज़ार सालों का ही लिखित इतिहास जानें तो महामारियों के रूप में विषाणु की मारकता भयावह परिणाम उत्पन्न करने वाली रही है। प्लेग, चेचक, मलेरिया, तपेदिक,स्पेनिश फ्लू, येलोफीवर जैसी ना जाने कितनी महामारियां विश्व सभ्यता में अपना हस्तक्षेप दर्शाती रहीं और इनमें से कुछ ने मनुष्य की सोच और जीवनधारा को बड़ी सीमा तक बदल देने में अपनी भूमिका निभाई।

किंतु इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आखिरी दौर में कोरोना विषाणु की त्रासदी अभी तक की महामारियों से कई मायनों में ज्यादा असरकारी एवं मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे अधिक परिवर्तनकारी सिद्ध होने वाली है।



ये अदृश्य सत्ता जीवनशैली से लेकर चिंतनशैली में मूलभूत बदलाव लाने को तत्पर है।

अदृश्य की रचनात्मक ऊर्जा

कहते हैं कि अदृश्यता अपने आप में एक शक्ति बन जाती है। एक ऐसा शत्रु जो बिना किसी आहट के प्रहार करे, उसे जीत पाना लगभग नामुमकिन होता है। और ये बात उन सभी महामारियों के लिए ज़िम्मेवार विषाणुओं के संदर्भ में सत्य है। वर्तमान अदृश्य ताकत से लड़ने में मनुष्य की सारी उन्नति, वैज्ञानिक उपादान, रणनीति व्यर्थ की कवायद साबित होने लगी है और ये विषाणु उसकी चिंतनशीलता,सामाजिक व्यवहार सहित उसकी खानपान और रहन-सहन की आदतें भी बदलने लगा है। आर्थिक गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगाने के साथ ही लोगों को उनके अपने घरों में कैद हो जाने के लिए विवश कर देने वाली ये शक्ति कुछ महत्वपूर्ण सोचने के लिए बाध्य कर रही है।

यूं अचानक बदल जाएगी दुनिया की तस्वीर कभी सोचा न था

इस त्रासदी ने सामान्य मनुष्य के शब्दकोष तक में इज़ाफ़ा कर दिया है। तमाम ऐसे शब्द जिनसे आम इंसान का कभी भी वास्ता नहीं रहा वे जनमानस का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। लॉकडाउन, क्वारंटीन, सैनेटाइजेशन, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे शब्द एक गैर-पढ़े इंसान के मुख से भी बड़ी आसानी से सुना जा सकता है। व्यापारिक गतिविधियों और लेन-देन के तरीकों में व्यापक बदलाव अपेक्षित है। मनुष्य की कथित प्रगतिगामी सोच को बदल कर रख देने वाले इस सर्वशक्तिमान की व्यापक क्षमता के भविष्यगामी प्रभाव का एक विश्लेषण सूचनात्मक से कहीं ज्यादा महत्व रखता है।

संयोग से इस आलेख के लिखने के दौरान मेरी एक पुराने मित्र से कुछ बड़ी दिलचस्प बातें हुईं। उनकी व्यथा दशा मुझे हैरान कर रही थी। निराशा और अवसाद में डूबी उनकी आवाज़ बहुत कुछ खुद ही बयां कर रही थी। उनसे बातचीत का एक संक्षिप्त अंश कुछ यूं है:

मित्र: मुझे लगता है कि संपत्ति और प्रतिष्ठा की दौड़ अर्थहीन है...........

मैं: ऐसा क्यों? आखिर ऐसे विचार क्यों आ रहे?

मित्र: मुझे तो शाश्वत सत्य के दर्शन होने लगे हैं। इस सत्य में जीवन कुछ अलग ही और बिल्कुल नए रूप में सामने दिखने लगा है, जो मैंने कभी नहीं देखा और महसूस किया।

नया सौंदर्य-बोध

उनकी बातों का सार तत्व यही था कि जीवन अब एक नए रंग-ढंग के साथ सामने आ रहा है। जो जरूरतें इस आपदा के पूर्व बहुत अनिवार्य मालूम पड़ती थीं, जिनके बिना जीवन सारहीन और बोरियत से परिपूर्ण मालूम होता था, उनकी बाध्यकारी अनुपस्थिति कोई फर्क नहीं पैदा कर पा रही है। वरन् ये एहसास बिल्कुल हो रहा है कि अभी तक हम भटक रहे थे, निरर्थक कवायदों में उलझ कर सौंदर्यबोध से विमुख हो चुके थे। एहसासों की नरमी, मनुष्यता का बोध, अल्प संसाधनों में जीवन को महसूस करते हुए,आत्मसात करते हुए प्रतिपल को जीना शायद हमें आने लगा है। वाह्य संचरण की अपेक्षा अंतर्यात्रा शुरू हो चुकी है। संसाधनों की बहुतायत की व्यर्थतता सिद्ध हो रही है। जटिलताओं में स्वयं को उलझाकर अवसाद में जाने की बजाय, हम उस जीवन के मज़े लेने में सक्षम हो रहे हैं, जो कभी अकल्पनीय था।

अकल्पनीय दुनिया प्रकट रूप में हमारे सामने उपस्थित है। जिस संसार को भौतिक संसाधनों के बल पर जीत लेने की कवायद जारी थी, आज उसकी निःसारता भी जाहिर है। सहज जीवन अपने पूरे सौंदर्य के साथ हमारे सामने साकार हो रहा है। शायद इस त्रासदी के अंत तक दुनिया के रहन-सहन और सोच में एक सार्थक अंतर आ चुका हो।

जिस सामाजिक दूरी की बात कभी निंदात्मक थी, आज उसे मान्य व्यवहार करार दिया गया है, जिस हाइजीन को कभी उलझाव मान कर लोग दरकिनार करते थे, उसे स्वतः अपनाया जा रहा और वो भी पूरी शिद्दत के साथ, जिस खानपान के सादगी के अंदाज़ को पाषाण संस्कृति का प्रतीक मान कर प्रहसन किया जाता था, उसे ही अपनाना गर्व और बेहतर जीवनशैली का प्रतीक माना जा रहा।

पाश्चात्य पर प्राच्य की पुनर्वापसी

कभी सगर्व जिस संस्कृति की मान्यता समस्त संसार में थी, जिस जीवन पद्धति का घोष पूरी दुनिया में सुना जाता था आज एक त्रासदी ने उसकी सहज वापसी की राह तय कर दी है। मिलते वक्त हाथ को मिलाने की वैश्विक परपंरा निंदित होकर नमस्ते पद्धति की स्वीकार्यता बहुत कुछ बयां करने में सक्षम है। शाकाहार को स्वास्थ्य रक्षण का सबसे बड़ा तंत्र मान लिया गया और शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता को मज़बूत बनाने पर बल दिया जा रहा है.................आरोग्य की प्राच्य विधाओं की व्यापकता स्वतःस्फूर्त हो चुकी है, इसके लिए किसी विज्ञापन की आवश्यकता नहीं। स्वयं का कार्य करने में शर्म की बजाय गर्व की अनुभूति होने लगना और बाहरी दुनिया में बोरियत मिटाने के साधन खोजने की जगह परिवार के साथ मानसिक जुड़ाव बढ़ जाना एक महान क्रांतिकारी बदलाव को सूचित कर रहा है................


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